सौ साल की आत्मकथा

यह गांधी की आत्मकथा यानी ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ का शताब्दी वर्ष है। हालांकि गांधी की आत्मकथा का शताब्दी वर्ष का ठीक ठीक निर्धारण कठिन है। क्योंकि गांधी ने आत्मकथा मूलतः गुजराती में लिखनी शुरू की और वह उनके दो प्रमुख पत्रों यंग इंडिया और नवजीवन में धारावाहिक रूप से नवंबर 1925 से फरवरी 1929 तक हर हफ्ते प्रकाशित हुई। इसका गुजराती नाम सत्यना प्रयोगो या आत्मकथा है जिसका पहला खंड 1926 में प्रकाशित हुआ। इसमें गांधी के जन्म से लेकर उनके लंदन प्रवास तक की कथा है।

दूसरे खंड में उनके भारत में संघर्ष के आरंभिक दिन से लेकर दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष और 1920 में हुए नागपुर के कांग्रेस सम्मेलन तक की कहानी है। गुजराती संस्करण का दूसरा खंड 1928 में आया। अंग्रेजी में यानी एन आटोबायोग्राफी आर द स्टोरी आफ मॉय एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ क्रमशः 1927 और 1929 में प्रकाशित हुई। इसलिए गांधी जनों के लिए यह छूट है कि वे 1925 से लेकर 1929 तक कभी भी गांधी की आत्मकथा का शताब्दी वर्ष मना सकते हैं। उनकी आत्मकथा का हिन्दी नाम सत्य के साथ मेरे प्रयोग है जिसका गुजराती से अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी ने किया है। जबकि गुजराती से अंग्रेजी का अनुवाद महादेव देसाई और प्यारेलाल ने किया है।

धार्मिक पुस्तकों, जिनकी पहुंच असाधारण होती है, को छोड़ दें तो किताबों की दुनिया में गांधी की आत्मकथा व्यावसायिक तौर पर अपनी वैश्विक व्याप्ति रखती है। अनुमानित तौर पर अब तक इस पुस्तक की एक करोड़ से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं। पुस्तक के मूल प्रकाशक नवजीवन ट्रस्ट ने देश में 58 लाख प्रतियां बेची हैं। हर साल इसकी दो लाख से अधिक प्रतियां बिकती हैं। इसका 16 भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है।

गांधी की आत्मकथा ने मानवता पर असर डाला है लेकिन जो वास्तविक और प्रभावी असर होना है लगता है वह अभी बाकी है। उसकी वजह यह भी है कि पुस्तक की कथा अवधि गांधी के जीवन के 50 वर्षों तक ही सीमित है। पुस्तक की कथा वहीं पर ठहर जाती है। गांधी इसकी दो वजहें बताते हैं। एक तो उसके बाद का उनका प्रयोग अपना न होकर कांग्रेस के साथ किया गया प्रयोग है और दूसरे उसके बाद उनका जीवन इतना सार्वजनिक हो गया कि कुछ नया कहने लायक बचता नहीं। आत्मकथा का उपसंहार करते हुए गांधी लिखते भी हैं कि मैं बड़े दुःख के साथ पाठकों से विदा लेता हूं। मैंने सच्ची कहानी कहने में बड़ी पीड़ा उठाई है। 

गांधी के जीवनी लेखक और उनके पोते राजमोहन गांधी ‘मोहनदासः अ ट्रू स्टोरी आफ अ मैन हिज पीपुल एंड एन इम्पायर’ में लिखते हैं कि पुस्तक के आरंभ में गांधी ने स्वीकार किया है कि उन्होंने कुछ छोड़ दिया। ‘कुछ चीजें मेरे और मेरे रचनाकार के बीच की हैं। वे अकथनीय हैं।’ वैसी चीजें क्या हो सकती हैं इसका महज अनुमान ही लगाया जा सकता है। वे परमेश्वर से की गई सख्त शिकायतें हो सकती हैं। अधूरी उम्मीदों की पीड़ा हो सकती है। या वे विशेष ईश्वरीय संदेश हो सकते हैं। क्या था कुछ कहा नहीं जा सकता।

कुछ ऐसी चीजें थीं जो दूसरों को मालूम थीं और वे डरे हुए थे कि गांधी अपनी आत्मकथा के धारावाहिक लेखन में उसका जिक्र करेंगे पर उन्होंने उसे छोड़ दिया तो लोगों ने राहत की सांस ली। जैसे कि सरला देवी चौधुरानी का प्रसंग। वे तब जीवित थीं और संभवतः गांधी उन्हें कोई नया दुःख नहीं देना चाहते थे। शेख मेहताब की घटना का जिक्र हुआ पर उनका नाम नहीं लिया गया। मेहताब वे व्यक्ति थे जो गांधी को मांसाहार और वेश्यावृत्ति की ओर ठेलना चाहते थे। गांधी की आत्मकथा जब साप्ताहिक पत्रों में धारावाहिक छप रही थी तब उनके दक्षिण अफ्रीका के साथियों ने भी कठोर आपत्तियां उठाई थीं।

उनके एक थे उनके साथी हेनरी पोलक। पोलक ने कहा कि गांधी कैसे दक्षिण अफ्रीका के उस यहूदी सर्राफ गैबरिल आइजक को भूल सकते हैं जिन्होंने भारतीयों की दिल खोलकर मदद की। जबकि गांधी की निजी सचिव रही सोनजा श्लेसिन को श्रीमती बोग्ट का जिक्र न करने की शिकायत थी। उनकी शिकायत यह भी थी कि गांधी को उनके निजी पत्रों को गोपनीय रखना चाहिए था और अगर उनको सार्वजनिक करना ही था तो उनसे अनुमति लेकर करना था। उन्होंने इस विश्वास भंग की संज्ञा दी और आठ पेज का कड़ा पत्र लिखकर कहा कि जो बात यंग इंडिया में लिख दिया उसे पुस्तक में न डालें। उन्होंने कुछ और आपत्तियां उठाते हुए कहा कि महात्मा को झूठ नहीं बोलना चाहिए। गांधी के दूसरे नंबर के बेटे मणिलाल को भी कुछ चीजें छूट जाने की शिकायत थी।

लेकिन दक्षिण अफ्रीका के कुछ संवाददाताओं को इस बात की खुशी थी कि गांधी ने बहुत बेबाकी से लिखा है। एक ने तो कहा कि कस्तूरबा के साथ क्रूरता की बात को लिखना बड़े साहस का काम है। उसका उत्तर देते हुए गांधी ने कहा, “ जाहिर सी बात है कि आप ने यह नहीं सोचा होगा कि मैंने इस क्रूरता का स्मरण गर्व के साथ किया है या मैं किसी प्रकार की क्रूरता करने लायक हूं। लेकिन जो मुझे एक सज्जन और पत्नी को प्यार करने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि मैं एक जानवर भी हूं। तभी एक मित्र ने मुझे एक पवित्र गाय और हिंस्र व्याघ्र भी कहा है।”

अंग्रेजों के अखबार टाइम्स आफ इंडिया ने लिखा, “ पुस्तक पढ़कर लगता है कि यह व्यक्ति महाअहंकारी है। यह एक ऐसे व्यक्ति की आत्मकथा है जो दंभी है और मानव व्यवहार के बारे में अपने प्रयोगों पर आत्मसंतुष्ट है। कामेच्छा और संपत्ति की इच्छा मनुष्य की सामान्य इच्छाएं हैं। जबकि गांधी ब्रह्मचर्य और संपत्ति त्याग की बात करते हैं। बोल्शेविकों ने रूस में निजी संपत्ति समाप्त करने की कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। गांधी वह करना चाहते हैं जिसकी आशा सोवियतों ने छोड़ दी।”

शंघाई के एक अंग्रेजी अखबार ने गांधी की आत्मकथा की सूक्ष्म और गंभीर समीक्षा की। उसने लिखा कि दुनिया में बहुत कम संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को बेझिझक तौर पर प्रचार की अग्निपरीक्षा के समक्ष अरक्षित छोड़ दिया है। हालांकि गांधी एक गंभीर और धैर्यवान चिंतक नहीं हैं पर वे एक धुनी व्यक्ति जरूर हैं जिन्होंने अपने पाठकों पर भोजन, दवा और हाथ की कताई को लेकर पन्ने दर पन्ने उतार दिए हैं।”

गांधी के मित्र और नोबेल साहित्यकार रोम्यां रोलां ने गांधी की आत्मकथा उसी समय पढ़ ली जब वह दो साप्ताहिकों में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो रही थी। क्योंकि वे आत्मकथा के प्रकाशन आरंभ होने से पहले ही ‘महात्मा गांधी’ नाम से उनकी प्रसिद्ध जीवनी लिख चुके, जिसमें उन्होंने गांधी की तुलना ईसा मसीह से की थी। उनकी पुस्तक के स्रोत के तौर पर यंग इंडिया के अंक और रवींद्र नाथ टैगोर से हुई बातचीत काम आई थी। आत्मकथा के प्रकाशन के दौरान गांधी की शिष्या और अंग्रेज महिला मैडलीन स्लेड यानी मीरा बहन उन्हें उसके बारे में जानकारी भेज दिया करती थीं।

रोलां ने आत्मकथा में दर्शायी गई गांधी की संवेदनशील और निष्कलुष ईमानदारी की तारीफ की और कहा कि वह ऐसा संत है जो बिना नकाब के रहता है। जबकि पारंपरिक संत अपने को काफी तोप ढक कर रहते हैं। लेकिन उन्होने विज्ञान और तार्किकता को न स्वीकार करने के लिए गांधी की आलोचना की और यह भी कहा कि गांधी में हिंदू और जैन परंपरा का गहरा कट्टरपन है।

गांधी की आत्मकथा की प्रशंसा आयरलैंड के नाटककार और आलोचक जार्ज बर्नार्ड शा ने भी की और कहा कि वे आत्मकथा इसलिए नहीं लिखेंगे क्योंकि वे गांधी जितने ईमानदार नहीं हो सकते। उनका मानना था कि ज्यादातर आत्मकथाएं झूठ का पुलिंदा होती हैं। लेकिन गांधी की आत्मकथा उस परंपरा की अपवाद है। अमेरिका के काले लोगों के नागरिक अधिकारों के पुरोधा मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने 1950 के दशक में गांधी की आत्मकथा 21 साल की उम्र में तब पढ़ी जब वे पेनसिल्वेनिया के किंग क्रोजर थियोलाजिकल सेमिनरी में एक छात्र थे। उसके एक दशक बाद उन्होंने उसे अपने आंदोलन की प्रेरणा शक्ति के रूप में स्वीकार किया।

दक्षिण अफ्रीका के अश्वेत नेता नेल्सन मंडेला ने अपने 27 साल के जेल जीवन में गांधी से बहुत कुछ सीखा। उन्हें 1964 से 1982 तक राबिन आइलैंड पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के साथियों के साथ कैद रखा गया था। तब उन लोगों ने उस जेल को एक विश्वविद्यालय का रूप दे दिया था। वैसे कहा जाता है कि मंडेला की रुचि ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ में अधिक थी क्योंकि उसमें दक्षिण अफ्रीका में गांधी के संघर्ष की कहानी और सत्याग्रह जैसे आयुध के आविष्कार का रहस्य छुपा था।

गांधी की दोनों महत्त्वपूर्ण पुस्तकें ‘दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ और ‘सत्य के मेरे प्रयोग’ एक के बाद एक होने वाले रचनात्मक उत्पाद हैं। दक्षिण अफ्रीका 1924 से 1925 तक धारावाहिक छपी तो आत्मकथा नवंबर 1925 से 1929 तक। एक पुस्तक राजनीतिक है तो दूसरी पूरी तरह से निजी और आध्यात्मिक। लेकिन गांधी के पुस्तक लिखने का यह समय राजनीतिक सक्रियता से विश्राम का समय है। इस समय वे एक ओर देश और दुनिया के समक्ष अपने को सत्य के सिपाही साबित करना चाहते थे तो दूसरी ओर एक सच्चा हिंदू। वे कितने सफल हुए यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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